135 views 0 comments

मुकदमा साबित करने के लिए पुलिस ने मरने वाले की मां और बहन को ही बना दिया फर्जी गवाह

by on February 13, 2018
 
Spread the love

– मामला अदालत में आते ही खुली पोल, आरोपी बरी

पश्चिमी दिल्ली, (पंजाब केसरी): अपनी थ्योरी को अदालत के समक्ष साबित करने के लिए जांच एजेंसियां किस हद तक झूठ बोल सकती हैं इसका ताजातरीन उदाहरण नरेला इलाके में हुए हत्या के एक मामले में देखने को मिला। अपने कमजोर मुकदमें को मजबूती देने के लिए दिल्ली पुलिस ने मृतक की मां और बहन को मौका-ए-वारदात पर प्लांटेड गवाह बना दिया। मामला जब अदालत पहुंचा तो हाईकोर्ट ने घटनास्थल पर दोनों की मौजूदगी पर ही गहरे प्रश्नचिन्ह लगाते हुए आरोपियों को बरी कर‌ दिया। इससे पहले रोहिणी जिला अदालत ने अभियोजन की थ्योरी को सही मानते हुए अजेंदर उर्फ मोनू और सुमित उर्फ सैम को हत्या के मामले में उम्र कैद की सजा सुनाई थी।

क्यों किसी ने नोटिस नहीं की मां और बहन की मौजूदगी…

जांच एजेंसी का कहना है कि जिस जगह मृतक की हत्या हुई वहां से चंद कदमों की दूरी पर मृतक की बहन और मां कार में बैठी थी। न्यायमूर्ति एस मुरलीधर और आईएस मेहता की खंडपीठ ने कहा कि हत्यारों के जाने के बाद वे न तो स्वयं मृतक को लेकर अस्पताल पहुंचे और न ही उन्होंने पीसीआर को कॉल कर घटना की जानकारी देने की जहमत उठाई। दावा किया गया कि मां-बेटी वारदात के बाद करीब 20 मिनट तक मौके पर रहे, लेकिन इसके बावजूद वहां किसी भी गवाह ने उनकी मौजूदगी को नोटिस तक नहीं किया। दोनों गवाहों का दावा है कि वे आरोपियों को पहले से जानते थे, ऐसे में पुलिस के मौके पर पहुंचने के बावजूद भी उन्होंने इसकी जानकारी क्यों नहीं दी।

पीछा करने में असफल पुलिसकर्मियों ने भी नहीं दी पीसीआर को सूचना..

मां का कहना है कि वह स्वयं अस्पताल पहुंची थी, लेकिन किसी ‌का भी उन्हें अस्पताल में नोटिस नहीं करना संदेह पैदा करता है। खंडपीठ ने कहा कि मौके पर करीब दो हजार लोग थे। घटनास्थल के पास मौजूद पुलिसकर्मी ने वारदात के बाद भाग रहे बदमाशों का पीछा कर पकड़ने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें पकड़ पाने में विफल होने के बावजूद भी पुलिसकर्मियों ने पीसीआर कॉल कर घटना की जानकारी देने की जहमत नहीं उठाई।

नहीं एकत्रित किए अहम सुबूत..

अदालत ने कहा कि मृतक के कपड़े डॉक्टरों ने पुलिस को सौंप दिए थे, जिन्हें आगे एफएसएल के लिए भेज दिया गया। इसके बावजूद भी कड़ी से कड़ी जोड़ने के लिए जांच एजेंसी ने कपड़ों को ट्रायल के दौरान अदालत के समक्ष पेश नहीं किया। बताया गया कि वारदात के वक्त मृतक अपनी पत्नी के साथ कपड़े खरीद रहा था, जबकि मां और बहन कार में थे। पत्नी इस मामले में सबसे मजबूत प्रत्यक्षदर्शी हो सकती थी, लेकिन उन्हें इस मामले में एग्जामिन ही नहीं किया गया। इस मामले में दुकानदार और उसका असिस्टेंट पहले ही अपने बयान से पीछे हट चुके हैं। ऐसे में मां-बेटी और बदमाशों का पीछा करने का दावा करने वाले पुलिसकर्मियों के बयान पर विश्वास नहीं ‌किया जा सकता है। लिहाजा दोनों आरोपियों को बरी किया जाता है। बचाव पक्ष के वकील एलएस सैनी ने कहा कि पुलिस की थ्योरी बनावटी थी जिसकी अदालत में पोल खुल गई है।

Be the first to comment!
 
Leave a reply »

 

You must log in to post a comment